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चांद और आसमां...

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  एक ही चांद है  एक ही आसमां फिर कैसे कहे अलग है दोनों के जहां तुम बसते हो मेरी बिंदिया में जब मैं संवरती हूं तुम हो मेरे नैनों में जब मैं आंखे बंद करती हूं तुम हो मेरी काजल में जो मुझे हर नजर से बचाती है तुम हो मेरे मन में जो हर पल तुम्हारी याद दिलाती है तुम हो मेरे ईश्वर में जब मैं उनको निहारती हूं तुम हो मेरे एहसास में जिसको मैं अपना मानती हूं तुम हो मुझमें  जब मैं खुदको ही तकती हूं हर नज़र से बचाकर  तुम्हें अपनी दुआओं में रखती हूं।

नाम है क्या?

 यूं जो चुप सा है उर, कोई पैगाम है क्या खोया सा है, कोई इलज़ाम है क्या गया है अभी तो सफ़र अश्कों तक रुकने का कोई नाम है क्या ....?      Shivaniajayparmar

जिंदगी की दौड़

 सुकूं भी खोया सा है कुछ गलत सही की ओट में कोई टूटे तारा तो बता दे छूटने की होड़ में कितने ही किस्से खोए जिंदगी की इस दौड़ में....

बातें रोज की (भाग -1)

 वहीं 6:00 बजे के आसपास अलार्म की आवाज और ना चाहते हुए भी उठ जाना। रोज की तरह आज का दिन भी  ठीक वैसा ही था। जल्दी में ऑफिस के लिए निकल गई थी।वही गर्मी में ऑटो में अपने ही ख्यालों में खोई रहने वाली मैं ऑफिस के रास्ते में थी कि अचानक किसी को ऑटो से उतरना था और मेरे सामने बैठा लड़का उसके उतरने के बाद थोड़ा आराम से बैठने लगा तभी उसका पैर अचानक हल्का सा मेरे पैर पर लगा उस परिस्थिति में शायद वो आम ही था लेकिन जैसे ही मैंने देखा उसने बिना सोचे माफी मांगकर झट से मेरा पैर छू लिया शायद ये कहने को तो कोई बड़ी बात नहीं थी लेकिन जैसे उस अनजान लड़के ने अपने संस्कारों की पहचान सी बना दी हो। मैं आज यहीं सोचती रहीं कि जहां लोगों को आज के दौर में हसीं मजाक में महिलाओं को गाली देना आम लगता हैं वहीं आज ऐसे लोग भी हैं जो शायद झुक जाते तो उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंच जाती।  सच कहां है शायद ये बात कहने में कुछ खास ना ही हो लेकिन मेरे लिए दिल छू लेने वाली है क्योंकि सम्मान एक ऐसा तोहफा है जो आज भी महिलाओं के लिए हर तोहफे से ऊपर हैं...

वो बहुत खूबसूरत है...🌺

 सोचा था हाल चाल पूछेंगे कुछ यादें साथ में बाटेंगे क्या पता था मिलने की खुशी नहीं  सुंदर और बदसूरत का राग अपने ही रिश्तेदार अलापेंगे कैसे है कोई कमी जिसको ईश्वर ने बनाया है बदसूरत वो नहीं ऐसी सोच है जिसको तुमने अपनाया हैं... ऐसा होता है ना? हम कभी-कभी अपने ही लोगों से घबराते है कहीं ना कहीं ऐसी बात हमारे घर में आने वाले मेहमान या हम जब कहीं मेहमान बनते है तब या हो सकता है किसी विशेष कार्यक्रम में जब रिश्तेदार मिलते है या कभी अपने ही दोस्तों के बीच अक्सर ही ये बात देखने को मिलती है अरे,तुम तो बहुत मोटे हो गए हो,तुम कितने पतले हो ऐसे अच्छे नहीं लगते,अरे देख ये थोड़ा काला है, नहीं इसका नाक नक्श देख अच्छा नहीं है, जैसी ना जाने कितनी ओछी बातें। कभी ये बातें पीछे से होती है तो कभी इनको लेकर मजाक बना दिया जाता है और वो बात ऐसे ही टाल दी जाती है लेकिन क्या कभी सोचा है इन सब बातों को करके उस इंसान में आप हीन भावना पैदा कर देते है। आप उसके मन को कितनी ठेस पहुंचा रहे है जो ना तो इंसानियत की दृष्टि से सही है और ना ही कानूनी दृष्टि से। आपके लिए शायद वो एक बात या दो पल का मजाक होगी लेकिन आप...

"Abide with me" से "अ मेरे वतन के लोगों"

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देश में गणतंत्र दिवस हर वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाता है, ये तो सभी को पता है लेकिन क्या आप जानते है हर वर्ष मनाए जाने वाले गणतंत्र दिवस पर आप भारत के किसी गाने की धुन की बजाय स्कॉटलैंड की धुन सुनते है। जिसका नाम है "Abide with me" जिसका अर्थ है "हे प्रभु! तुम मेरे साथ रहो( दो)"और इस बीटिंग रिट्रीट को अब केंद्र सरकार ने हटाकर देशभक्ति और देशप्रेम का गाना जिसे शायद सभी भारतीयों ने सुना होगा "अ मेरे वतन के लोगों को" बीटिंग रिट्रीट में शामिल किया है।  वहीं इस स्कॉटलैंड धुन को "गांधी जी" की पंसदीदा धुन होने की वजह से बीटिंग रिट्रीट में शामिल होने की बात भी कहीं जाती थी।लेकिन Zee news के संपादक "सुधीर चौधरी" ने अपने शो DNA के माध्यम से बताया कि कहीं भी पुराने दस्तावेजों या पुस्तकों में इस बात का जिक्र नहीं कि ये "महात्मा गांधी की पसंदीदा धुन थी।उन्होनें इस धुन को सुना जरूर था लेकिन ये उनकी पसंदीदा धुन नहीं थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद ऐसा कहा जाने लगा की ये उनकी पसंदीदा धुन थी और इसे गणतंत्र दिवस पर बजाया जाने लगा था।

सिक्का और आदमी...

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एक सिक्के के दो पहलू होते है और सबने जीवन में बहुत बार सुना भी होगा।वैसे ही इंसान के भी दो पहलू होते है।एक वो जो आपको दिखाई देता है,आपके साथ या दूसरों के साथ जो व्यवहार होता है अथवा जो वो आपको दिखाते है या दिखाना चाहते है।लेकिन इसके उलट एक सिक्के की भांति एक दूसरा पहलू भी होता हैं और उससे आप अनभिज्ञ होते है या वो आपको कभी या अचानक या ये भी हो सकता है कि किसी कारणवश या किसी परिस्थिति में आपको दिख जाए। शायद तब आश्चर्य होगा या फिर नहीं भी। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है जरूरी नहीं जो इंसान जैसा दिखता है वैसा हो या फिर हो सकता है आप उसे जैसा देखते है असल में वो वैसा ना हो या फिर आपको ही कुछ गलत लगा हो या वो हर परिस्थिति के अनुसार खुद को ढाल लेता या बदल लेता हो।ये शायद हम,हमारा करीबी,सगे-संबंधी या खुद भी होते है तो दूसरों का तो हम खुद भी अंदाजा लगा सकते है। जैसे अगर कोई अधिकारी अपने परिवार के साथ अलग है लेकिन वहीं किसी भी विषय से जुड़ा अधिकारी अपने काम के समय (अपने पेशे में) अलग होता है।वहीं एक लुटेरा दूसरों को लूट सकता है लेकिन घरवालों को नहीं। इसीलिए किसी का सिक्का होना परिस्थिति की मांग या ...